आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चेहरे पे अश्कों के निशान देखते हो।।

                
                                                         
                            मज़मून छोड़कर,यूं उन्वान देखते हो।
                                                                 
                            
चेहरे पे अश्कों के निशान देखते हो।।

पहले तो, तुम हमसे दूर चले गये हो।
फिर , कुरबतों के इम्कान देखते हो।।

अगरचे साहिब-ए-असबाब हो,मगर।
क्यूं फिर भी,ख़्वाब वीरान देखते हो।।

सारी हसरतों को, सुला दिया है मैंने।
फिर भी , तुम मेरे सामान देखते हो।।

वो भीड़,जिसने उजाड़ा नशेमन मेरा।
उस भीड़ में भी,तुम इंसान देखते हो।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
18 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर