मज़मून छोड़कर,यूं उन्वान देखते हो।
चेहरे पे अश्कों के निशान देखते हो।।
पहले तो, तुम हमसे दूर चले गये हो।
फिर , कुरबतों के इम्कान देखते हो।।
अगरचे साहिब-ए-असबाब हो,मगर।
क्यूं फिर भी,ख़्वाब वीरान देखते हो।।
सारी हसरतों को, सुला दिया है मैंने।
फिर भी , तुम मेरे सामान देखते हो।।
वो भीड़,जिसने उजाड़ा नशेमन मेरा।
उस भीड़ में भी,तुम इंसान देखते हो।।
-यूनुस खान
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