ऐसा रूस्वा सर-ए-बाज़ार कोई दूसरा दिखा।
हो हमसा तेरा तलबगार , कोई दूसरा दिखा।।
हमेशा , हर ग़म तेरा सर-बसर बांटा है हमने।
इस कदर गमख्वार , तेरा कोई दूसरा दिखा।।
यूं सर-ए-राह तेरा बिछड़ना , खलता है मुझे।
तर्क-ए-ताल्लुक सा खार,कोई दूसरा दिखा।।
हद-ए-निगाह तक सन्नाटे हैं, आंगन में जहां।
मेरे घर जैसा सूना दयार, कोई दूसरा दिखा।।
एक मुद्दत से जो दर्द,मुझको सोने नहीं देता।
दवा का उस सा हक़दार कोई दूसरा दिखा।।
-यूनुस खान
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