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अधजले ख़तों में, तेरे पैग़ाम ढूंढ रहा हूं।

                
                                                         
                            अधजले ख़तों में, तेरे पैग़ाम ढूंढ रहा हूं।
                                                                 
                            
यूं हिज़्र की सहर की , शाम ढूंढ रहा हूं।।

मैं मुसाफ़िर हूं, मेरा मुकद्दर ये सफर है।
शिद्दत से, मैं अपना मकाम ढूंढ रहा हूं।।

दर-ए-मयखाना बंद हुए एक मुद्दत हुई।
नादां हूं, मैं अभी तक जाम ढूंढ रहा हूं।।

कल तक, जिनको शहर-बदर होना है।
उस फहरिस्त में, मेरा नाम ढूंढ रहा हूं।।

हर झोंका महका है , रूसवाई से मेरी।
मैं अपने सर लगे, इल्ज़ाम ढूंढ रहा हूं।।
-यूनुस खान
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3 घंटे पहले

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