लब अगर ख़ामोश थे,तो इशारों से करते।
वो , कुछ तो गुफ्तगू हम बेचारों से करते।।
ताउम्र जलने का वादा करके बुझ गये थे।
तो फिर,क्या गिला हम सितारों से करते।।
मंझधारों ने, पनाह देना गवारा ना किया।
फिर क्यूं,कोई तवक्को किनारों से करते।।
वीरानों की ही बज़्म, सजी थी हर सिम्त।
क्यूं ज़ाहिर,कोई हसरत नज़ारों से करते।।
घर के आइने, बेवफाई पर उतर आये थे।
कैसी शिकायत घर की दीवारों से करते।।
- यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X