एक मुद्दत से,हर सिम्त निहार रहा हूं।
जाने कब से , तुझको पुकारा रहा हूं।।
तेरी कुरबत का जो नशा था मुझको।
अपने उस सुरुर को मै उतार रहा हूं।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X