मायूसियों के दरम्यां, एक आस जगाई तूने।
मेरी ख़ामोशी को क्यूं , आवाज लगाई तूने।।
वहम-ओ-गुमां के दम पर जिंदा थी हसरतें।
क्यूं इन ख्वाहिशों को हक़ीक़त बताई तूने।।
जख़्मों ने तो यूं सब्र करना सीख लिया था।
नाहक, फिर क्यूं मेरे दर्द को दी दवाई तूने।।
-यूनुस खान
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