आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जख़्मों ने तो यूं सब्र करना सीख लिया था।

                
                                                         
                            मायूसियों के दरम्यां, एक आस जगाई तूने।
                                                                 
                            
मेरी ख़ामोशी को क्यूं , आवाज लगाई तूने।।

वहम-ओ-गुमां के दम पर जिंदा थी हसरतें।
क्यूं इन ख्वाहिशों को हक़ीक़त बताई तूने।।

जख़्मों ने तो यूं सब्र करना सीख लिया था।
नाहक, फिर क्यूं मेरे दर्द को दी दवाई तूने।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
48 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर