आंखों से, अश्कों का निकलना बाकी है।
अभी तो,शब-ए-ग़म का ढलना बाकी है।।
मंजिल पाकर भी,सफर ख़त्म नहीं हुआ।
राह-ए-हयात में अभी,संभलना बाकी है।।
शाम ढलते ही, यूं जाने की जिद ना करो।
चिराग बनकर,दिल का जलना बाकी है।।
चलते-चलते,ये पुरवाई यूं रूक क्यूं गयी।
शम्मा पर, परवाने का मचलना बाकी है।।
दोस्त को दोस्त समझने में, जल्दी कैसी।
अभी,दोस्तों का पाला बदलना बाकी है।।
दर पर कोई दस्तक, यूं महसूस हो कैसे।
कोई आहट,या पर्दे का हिलना बाकी है।।
बहारों से कहो , अभी जायें ना छोड़कर।
मुद्दतों बाद,यूं मेरा-तेरा मिलना बाकी है।।
-यूनुस खान
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