दवा-ए-दर्द बन गये हैं , ये अश्कों के धारे।
मुद्दतों पुराने ज़ख्म,हमने फिर से निखारे।।
उदासियों में जीने की आदत हो गयी हमें।
इन दिलकश मंज़रों को अब कौन संवारे।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X