आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आदत है मुझे

                
                                                         
                            हस्ब-ए-हालात, ढलने की आदत है मुझे।
                                                                 
                            
गिर-गिर कर संभलने की आदत है मुझे।।

हर हाल में हर एक वादा निभाया है मैंने।
ये ना सोच, यूं बदलने की आदत है मुझे।।

घर की खातिर , खुद को जलाया है मैंने।
ऐसा नहीं , कि जलने की आदत है मुझे।।

गर तुम चाहो तो तन्हा छोड़ दो सफर में।
अब तो अकेले चलने की आदत है मुझे।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
47 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर