कोरोना
बहुत हो चुकी चुप्पी चहचहाना चाहता हूँ ,
खामोश पड़े नगमें गुनगुनाना चाहता हूँ ।
कब तक ज़ुल्म ढाएगा कोरोना
कब तक ढूंढते रहेंगे हम कोना ,
बंद पड़ा रहा अब बाहर आना चाहता हूँ ।
बेलज़ीज़ खाने से तंग आ चुका
बेलज़ीज़ जीने से तंग आ चुका ,
कुछ जायकेदार चखना चाहता हूँ ।
न कोई दावत न कोई त्योंहार
न जन्मदिन न शादी की मनुहार ,
अपनों के साथ जश्न मनाना चाहता हूँ ।
कितनों ने अपनों को खोया
कितनों ने सपनों को खोया ,
कब मरेगा ज़ुल्मी इसे दफनाना चाहता हूँ ।
यतिराज बजाज “प्रेरणा”
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