मैं चूल्हे की चिंगारी नहीं ज़माना बदल गया है,
मैं पर्दे की नारी नहीं ज़माना बदल गया है ।
मैं भी आती हूँ अव्वल हर विषय की पढ़ाई में
मेरे हुनर को बांध न रखो सिलाई - कढ़ाई में ,
सिर्फ़ बच्चों की महतारी नहीं ज़माना बदल गया है ,
मैं पर्दे की नारी नहीं ज़माना बदल गया है ।
दफ़्तर हो या कारख़ाना दुकान हो या दवाखाना
हर जगह कौशल दिखा दिया अपना परचम फहरा दिया ,
सिंगार से सजी सवारी नहीं ज़माना बदल गया है ,
मैं पर्दे की नारी नहीं ज़माना बदल गया है ।
ज़रूरत पड़े तो लक्ष्मी बन जाती हूँ
दुर्गा और सरस्वती बन जाती हूँ ,
ज़ुल्म ढाने वालों की पारी नहीं ज़माना बदल गया है ,
मैं पर्दे की नारी नहीं ज़माना बदल गया है ।
अबला नहीं बला जब फ़ौजी बन जाती हूँ
डिजिटल हो या कैपिटल खोजी बन जाती हूँ ,
घर के हिसाब की डायरी नहीं ज़माना बदल गया है,
मैं पर्दे की नारी नहीं ज़माना बदल गया है ।
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X