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या फ़साना ही सुनाए बरगलाने के लिए

YA FASAANA HI SUNAYE BARGLAANE KE LIYE
                
                                                         
                            आपका आना है बस आना जताने के लिए
                                                                 
                            
आप अब आते कहाँ हैं सिर्फ़ आने के लिए

फिर कोई इक गीत गाए जी जलाने के लिए
या फ़साना ही सुनाए बरगलाने के लिए

आशिक़ी के नाम पर उसने फ़क़त इतना कहा
क्या भला मैं ही मिला था आज़माने के लिए

इस क़दर रुसवा हुआ हूं मैं के अब इस शह्र में
सोचते हैं लोग मुझको भूल जाने के लिए

मान जाने से भला मुझको ख़ुशी क्यूंकर हो जब
मान जाना है किसी का रूठ जाने के लिए

होश आया तो मैं जाना मैकशी क्या चीज़ है
एक यह जुमला बहुत है होश आने के लिए

मैंने पूछा किस लिए यूं हुस्न बे पर्दा हुआ
दफ्अतन बोला गया ग़ाफ़िल ज़माने के लिए

सोचता हूं ग़म में तेरे हो गया मयख़ोर पर
और भी हिक़्मत तो होगी ग़म मिटाने के लिए

इक ज़माना था के होती थी क़वायद शामो शब
छत पे आएँ चाँद का दीदार पाने के लिए

काश हो जाता कहीं ऐसा के हर बंदिश को तोड़
फिर चला आता कोई मुझको सताने के लिए

बात अब जब हो रही है चाँद सूरज की यहाँ
कौन ग़ाफ़िल आएगा दीया जलाने के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

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8 वर्ष पहले

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