मेरी इबादत भी बगावत नही करती
तेरी बज़्म, तेरी सूरत तेरा आंखें
रहती है मेरी नज़रों में,
तेरी रुस्वाईयां
मुझ पे असर करती नही है।
तुम्हारी तरह, हम भी
चाह ले किसी को,
तुम्हारे लौट के आने की उम्मीद
मगर दिल से छूटती नहीं है।
तुम रूठ के सजा
मौत की दे के गए जब से,
जिंदगी की तलब तब से
हमें लगती नही है l
मैंने तुम्हारे झूठ पे भी यकीं किया
तुम्हें मेरे सच पे ऐतबार नहीं,
छोड़ के जाने की ये तरकीब
तुझ पे जंचती नही है।
तुम न गुजरोगे मेरी गली से शायद अब
फिर भी आंखें बैठ गई दरवज्जे पे,
इक घड़ी को भी हटती नही है।
हम से भी ज्यादा शायद
चाह ले तुम्हें कोई,
फिर भी जी जान से तुम्हें चाहने की
फितरत बदलती नहीं है।
तेरा खुशियां, तेरी मुहब्बत
सब मुबारक हो तुझ को
मेरी तो इबादत भी
तुझ से बगावत नही करती है।
-डॉ नीरू जैन
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