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मेरे अल्फाज़

क्या आज शाम मुझसे मिलने आ सकती हो

Vivek Yadav

1 कविता

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सुनो एक गुज़ारिश है तुमसे
क्या आज शाम मुझसे मिलने आ सकती हो!!

महीनों गुजर गए हैं, तुम्हारा दीदार करना है,,
दिल की तमन्नाओं का आज इजहार करना है!!

बचा हो तनिक भी मन में प्यार तो आ ही जाना,,
तुम्हारे बिना अधूरा सा हूं मैं, समझती हो जाना!!

क्या पहले जो था, वही प्यार ला सकती हो,,
क्या आज शाम मुझसे मिलने आ सकती हो!!

ख्वाहिश है दिल की आज थोड़ा मुस्कुराऊं मैं,,
होकर रूबरू जिंदगी की हर दास्तां सुनाऊं मैं!!

फिर से लबों पर गुजरे लम्हों की कहानियां होगी,,
मिलकर तुमसे फिर वही पुरानी नादानियां होगी!!

क्या साथ, पुराना अल्हड़पन ला सकती हो,,
क्या आज शाम मुझसे मिलने आ सकती हो!!

तुम्हारी प्यार भरी मस्तियां जिसका मैं था कायल,,
वो अदाएं, जिससे दिल हो जाता था मेरा घायल!!

पता है तुम्हें, जैसे तुम मेरी कोई अधूरी ग़ज़ल हो,,
चाहता है दिल, ये अधूरी दास्तां अब मुकम्मल हो!!

क्या मुंतशिर दिल के टुकड़ों को ला सकती हो,,
क्या आज शाम मुझसे मिलने आ सकती हो!!

~विवेक यादव (हर्षवर्धन)



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