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क्षमा करें प्रभु, यह तो करनी का है फल

                
                                                         
                            जीवन की दौड़-धूप में,
                                                                 
                            
अनेक रंग देखे मैंने।
कभी अभावों में, कभी भावों में,
कभी कम, कभी अधिक देखे मैंने।
बचपन की हर बात लगती है प्यारी,
देवभूमि हिमालय की बात ही है न्यारी।
घने जंगल, खेत-खलिहान थे पावन,
लगते थे मन को अति भावन।
दादी का वह बात-बात पर डाँटना,
और फिर प्यार जताना।
जीवन का यही था अनमोल ख़ज़ाना।
माँ के हाथ के फुलके,
और भड्डू में पकी दाल का था ज़माना।
धारी का दूध, मंडुवे की रोटी में मक्खन,
पेट चाहे न भरे, पर दुःख हो गए थे कम।
अभावों में भी भाव था,
इंसान-इंसान के बीच प्यार था।
अब बदल गया सब कुछ, सब उलटा-पुलटा,
अपने ही हो गए पराये, इंसान हो गया झूठा।
अभाव तो अब नहीं रहे, पर भाव हो गए कम,
और हम हो गए स्वयं के दुश्मन।
औरों की बात क्या करें,
खुद के साये से ही डरे हुए हम।
मालूम नहीं कल क्या होगा,
इन्हीं बातों में उलझे हुए हम।
क्षमा करें प्रभु, यह तो करनी का है फल,
जैसा बोया था, वैसा ही तो पाएँगे हम।
— विश्वम्भर प्रसाद सती
 
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एक घंटा पहले

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