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अमृत और विष दोनों साथ पिऊँगा।

                
                                                         
                            हे मन, तुम कितने चंचल हो
                                                                 
                            
भोर से संध्या तक
अनेक रूपों में ढलते हो
कभी अट्टालिकाओं में ले जाकर
और फिर धड़ाम से गिरा देते हो।
पल भर में ही बदल जाते हो तुम,
हे मन, तुम कितने चंचल हो।
उस दिन प्रातः
कुछ मीठी यादों के साथ
भीनी-सी खुशबू लिए आए थे तुम,
कुछ कानों में फुसफुसाकर
फिर चले गए थे तुम,
मैं भाव-विभोर था।
और पलक झपकते ही
पहाड़-सा बोझ
मेरे ऊपर छोड़
तुम फुर्र से उड़ चले थे,
तब मैं कराह उठा था।
फिर दबे पाँव
मुझे टटोलने
क्यों चले आए थे मन तुम,
दिवास्वप्न दिखाते,
मीठी यादों के साथ
मुझमें प्रवेश करते,
संध्या तक
निष्ठुर भाव से
मुझे पुनः झकझोर जाते हो तुम।
कभी भय, कभी क्रंदन,
कभी शांति, कभी मनमोहक क्षण,
हे मन, तुम कितने चंचल हो।
कभी अपनों के पास, कभी जीवन की राह,
कभी दुखों का पहाड़, कभी निराशा की चाह,
तुम कितने निष्ठुर हो, हे मन।
पर अब मैं जाग जाऊँगा,
तुम्हारे बहकावे में नहीं आऊँगा,
जो है, बस उसी में जीऊँगा,
अमृत और विष दोनों साथ पिऊँगा।
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50 मिनट पहले

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