मन में उत्पन्न हुआ एक भाव—
क्या हम अपनी सोच का परिणाम हैं?
मन ने कहा—हाँ। अपनी सोच का परिणाम हो तुम,
जैसा सोचोगे वैसा ही तो करोगे,
और फिर करनी का फल पाओगे।
बात सच थी, अपनी सोच का परिणाम हैं हम।
इससे न थोड़ा अधिक, न थोड़ा कम।
फिर मन में उत्पन्न हुआ दूसरा भाव—
तो आज मनुष्य क्यों है लाचार?
कहाँ गए मनुष्य के सद्विचार?
मन ने उत्तर दिया—
अपना हित और दूसरों का अहित,
इसी से व्यभिचार हुआ है फलित।
विचारों से ही उत्पन्न हुए महायुद्ध,
संस्कृति एवं सभ्यताएँ हुईं अवरुद्ध।
सार्स, स्वाइन फ्लू, फ्लू, बर्ड फ्लू और अब कोरोना—
ये सब विचारों का ही है रोना।
अपनी सोच के परे हुए हम,
खुद के साये से डरे हुए हम।
रखो सोच को पवित्र, होगा मन, शरीर एवं वातावरण शुद्ध।
न होगी कोरोना जैसी महामारी, और न होंगे युद्ध।
मनुष्य जीवन है अनमोल, संभालो इसे।
कहीं खो न जाए कुसोच के भँवर में, सुविचार से पालो इसे।
अंततः ईश्वरीय सत्ता ही है सर्वोपरि, यह जान लो।
अपने भीतर उसके अंश को पहचान लो।
सदा करो ईश्वर को नमन,
इसी से होगा सबका जीवन सुगम।
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