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एक एहसास : यादें या अफ़सोस !

                
                                                         
                            कोई आया जिसने यह एहसास दिलाया,
                                                                 
                            
मेरी जीत तो हुई... पर मैं सब हार बैठा।
इस हार का बोझ संभल नहीं रहा मुझसे,
कोई गुनाह नहीं हुई है - बस उदास हूँ खुद से।

हालांकि अब तो कुछ खोने-पाने की,
उम्र भी नहीं बची,
बस दो-चार दाँत,
और उसकी एक तस्वीर बची है।

ऐसे में मैं अकेला भी कहाँ हूँ?,
मैं हूँ, ये दरवाज़े हैं, ये दीवारें हैं, सब हैं,
पर लगता है जैसे ये भी अब विदा कर रहे हैं,
धीरे-धीरे वैसे हीं मुझसे जुदा हो रहे हैं।

ये बड़े-बड़े टाई-बेल्ट लगाए खड़े लोग कहते हैं,
- अब बचना मुश्किल है मेरा।
इन्हें कौन समझाए भला,
वैद्य के बस का रोग नहीं है मेरा।

श्रापित हूँ मैं, अब मुझे छोड़ दो.....
अफ़सोस के सागर की दो घूँट लेने दो मुझे।

ये श्राप हीं तो है, अजीब रोग लगी है !
सब कुछ भूल बैठा हूँ,
मगर उसकी गर्दन का वह तिल,
आज भी सटीक याद है।

शायद इस रोग ने भी,
मुझ पर इतनी रियायत कर दी

 
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12 मिनट पहले

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