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बहुत टूट चुका हो

                
                                                         
                            इंसानों में उठता बैठता हूं इंसा नहीं मिलता,
                                                                 
                            
ये जो लोग बात करते हैं उनसे उनका चेहरा नहीं मिलता ।

बहुत टूट चुका हो कोई जर्रा -जर्रा बिखर गया हो,
ऐसे सहराओं में फिर खोजने से दरिया नहीं मिलता।

किस बर्फ़ ने कौन सी हवा ने इन्सानों को ठंडा किया है,
मरता है तब जब अंदर का ताप बाहर से नहीं मिलता।

मोहब्बत करता हूं, इस लिए फासला भी रखता हूं,
वरना आज के दौर में तपाक से गले कौन नहीं मिलता।

ये क्या कम है कि हम भी इस दौर में एक सिक्के के दो पहलू हैं,
जो गुजरा दौर तो गुजरे दौर का एक सिक्का नहीं मिलता।

मैं जानता हूं तेरा खूबसूरत बदन एक दरिया है,
तू सफर कर और उम्र भर के लिए समंदर से आ के क्यूं नहीं मिलता।

मिली है जो जिंदगी इसमें बच-बच के क्या-क्या करें,
धो चुका हो सारे पाप गंगा जी में ऐसा कोई नहीं मिलता।

विष्णु नेह
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2 घंटे पहले

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