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                            निशा बीती और भोर भयो
                                                                 
                            
फिर क्यों अंधियारा छाया है
वो स्वप्न सजाने आया था
अब मन ही मन झल्लाया है
भीतर से मन मिंज रहे सब
कोई चेहरे पे आ कर हंसता है
कुछ दुनिया से उम्मीद नहीं
बस देह त्याग इक रास्ता है

और ऐसा उसने ठान लिया
बैरी को अपना मान लिया
जो राह नहीं थी गमन योग्य
क्यूं उस पर प्रस्थान किया
सब कुछ जैसे दिखता पहले
अब वैसा क्यूं ना दिखता है
जीवन लिखने आया था वह
अंतिम पत्र क्यों लिखता है

कोई मर के वीर नहीं होता
कर्तव्य इसे समझाता कौन
हार विजय की माला है
इसको यह बतलाता कौन
थे सुख इसका जो बांट रहे
वे दुख में ना जाने कहां गए
दया ना आई तनिक उन्हें
व्याकुल देख रहे, हो मौन

था दो परदों को जोड़ रहा
फोन की घंटी बजी तभी
जब मां शब्द लिखा देखा
विचार विलुप्त हो गए सभी
बड़ी हिम्मत कर फोन उठाया
फिर मां पूछी कैसा है लाल
ठीक नही, वह रो के बोला
कुछ खास नहीं है मेरा हाल

अवसर छीन लिए बेशक
कोई संघर्ष छीन ना पाएगा
चलते चलते गिरा है तो क्या
तू फिर से खड़ा हो जाएगा
ले प्रभु नाम सब मंगल होगा
गुल्लक खुशी से खनकेगा
एक दिन तू भी आसमान में
सूरज की भांति चमकेगा
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एक वर्ष पहले

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