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उजड़े आशियाने की आख़िरी दीपावली

                
                                                         
                            — एक अधूरी स्मृति, कुछ अनकहे ज़ख़्म
                                                                 
                            

घर मेरा भी कभी त्योहारों पर सजता था,
दीपों की लौ से मेरा आशियाना जगमगाता था।
ख़ुशियों की एक अविरल धारा बह उठती थी,
अपनों के संग हर साँझ उत्सव बन जाती थी।

वो त्योहारों पर अपनों के संग यूँ झूमना,
वो हँसना, वो खिलखिलाना, वो बेफ़िक्र जीना।
न जाने वक़्त की किस करवट में सब खो गया,
वो हँसता-खेलता संसार जाने कहाँ चला गया।

फिर ग़म की एक ऐसी लहर उठी,
जो मेरे आशियाने को ही बहा ले गई।
किसे ख़बर थी उस दीपावली के त्योहार की,
वो अंतिम बगिया थी हमारी ख़ुशियों की बहार की।

अब जब दूसरों के घरों को जगमगाते देखता हूँ,
अपने उजड़े हुए कल को फिर से याद करता हूँ।
हर दीप की लौ मेरे पुराने ज़ख़्म कुरेद जाती है,
हर मुस्कान मेरी आँखों में नमी भर जाती है।

किससे कहूँ अपने हृदय की व्यथा,
किसे सुनाऊँ अपने टूटे स्वप्नों की कथा।
कुछ तो छोड़ जाते, ऐ ग़म की निर्मम लहर,
तुझसे तो इतनी भी उम्मीद न थी, ऐ सितमगर।

अपने ज़ख़्मों को शब्दों में ढाल नहीं पाता,
अपनी पीड़ा को कविता में भी बयाँ नहीं कर पाता।
कुछ यूँ मेरे ज़ख़्मों ने मुझे ज़ख़्मी कर दिया,
कि मेरी ख़ामोशी ने ही मेरा परिचय लिख दिया।

क़िस्मत भी मुझसे कुछ यूँ रूठकर बैठी है,
मानो मेरी ख़ुशियों से उसकी कोई पुरानी रंजिश हो।
मैंने तो किसी का बुरा भी नहीं चाहा था,
फिर मेरे हिस्से में इतना दर्द क्यों आया था?

ज़िंदगी यूँ करवट लेगी,
ये ख़्वाबों में भी कभी न सोचा था।
जिस आशियाने में ख़ुशियों के दीप जलते थे,
वहाँ मातम का अँधियारा होगा,
ये कभी न सोचा था।

आज ये ज़ालिम दुनिया पूछती है
मेरे पुराने ज़ख़्मों का हिसाब,
मगर यही दुनिया तो मेरे आशियाने के उजड़ने पर
मुस्कुराती रही थी बेहिसाब।

अरे, हमसे मत पूछो ज़िंदगी के हाल,
हमने अपनों को भी हँसते देखा है हमारे ग़म पर।
हमने उन चेहरों से नक़ाब उतरते देखे हैं,
जिनके पीछे हज़ारों झूठ पलते थे।

कभी जिनसे उम्मीद थी मरहम की,
उन्हीं हाथों में पत्थर देखे हैं।
जिन्हें अपना समझकर दिल में जगह दी,
उन्हीं के चेहरों पर अपने लिए तिरस्कार देखे हैं।

कभी कहा जाता था—
“समाज क्या कहेगा?”

मगर जब मेरा संसार उजड़ रहा था,
तब यही समाज मेरे ग़म पर हँस रहा था।
यूँ तो उम्मीद न थी इस बेरुख़ी की,
न अपनों से, न इस समाज से।

मगर अब शिकायत भी किससे करूँ,
जब अपने ही बिछड़ गए हों,
और दर्द ही रह गया हो मेरे पास।

आज भी दीपावली आती है,
आज भी दुनिया दीप जलाती है।
मगर मेरे आँगन में अब उजाला नहीं उतरता,
यहाँ कोई दीप मेरे अपनों की कमी नहीं भरता।

कभी मेरा घर भी ख़ुशियों का आशियाना था,
आज उसी घर की यादों में मेरा हर दीप बुझ जाता है ।
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22 घंटे पहले

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