न फ़ख़्र है खुद पर, न कोई गुरूर है,
बस अपनी राह पर चलने का सुरूर है।
हर नज़र मुझे सही समझे—ज़रूरी तो नहीं,
हर आईना मेरी तस्वीर दिखाए—ज़रूरी तो नहीं।
लोगों की बातों से रास्ते बदलते नहीं,
कुछ फैसले भीड़ से पूछकर लिए जाते नहीं।
ज़माना चाहे जितनी भी दलीलें देता रहे,
हर बात को सच मान लेना भी ज़रूरी तो नहीं।
मैं अपनी राह, अपने उसूलों के साथ चलूँगा,
गिरूँगा तो उठूँगा, मगर खुद से नज़रें नहीं चुराऊँगा।
क्योंकि सफ़र मेरा है, तो फ़ैसले भी मेरे होंगे,
लोग चाहे जो कहें—मेरे हौसले मेरे होंगे। 🖤
-विरम सियाग
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