तुम मुझे किसी भी नाम से पुकार लो,
हिंदी कह लो, अंग्रेजी बुला लो, उर्दू कह लो या फिर दुनिया की किसी भी भाषा के साथ मेरा तोल-भाव कर लो,
तुम कुछ भी कह लो...
मेरे शब्दों की गूँज दूर तक जाती है,
इसकी खनक की खुशबु रूह में बस्ती है ...
मानो या ना मानो पर, लफ़्ज़ों की महक दिल में घर कर लेती है ।
दिलों को जोड़ना हो, या फिर इल्म देना...जज़्बातों को ज़ाहिर करना – यही मेरा काम,
मगर तुम मुझे पत्थर बना, नफरतों के बीज बो देते हो...
दिमाग के किसी कोने में बैठे – शब्दों का, लफ़्ज़ों का आपस में भिड़ना,
वो समझ आता है – तुम्हें लिखा जाएगा या फिर मुझे बोला जाएगा,
पर इन्सानों का किसी भाषा को लेकर झगड़ना समझ नहीं आता ।
ज़बान से परे भी एक भाषा है, जज़्बातों की ये भाषा कहती है...
अरे ओं इन्सान – मैं तुम्हारे अन्दर ही बस्ती हूँ,
मुझे तुम सीखते नहीं, महसूस करते हो,
नकार मुझे तुम सकते नहीं,
मेरे बिना तुम्हारी शख़्सियत नहीं।
वो भाषा, ये भी कहती है मुझसे और तुमसे...
गुज़ारिश है मेरी – प्यार की उस ज़बान को बहने दो,
ख़ुद को उस जज़्बातों की भाषा से एक कर लो,
भावनाओं के उन कीमती मोतियों को पिरोए रखो,
फ़िर भाषा कोई भी हो,
जीवन की बागडोर बेलगाम बिरले ही होगी।
इसे तुम जज़्बातों की ज़बान कह लो या फिर भावों की भाषा...
ये भूले नहीं भूलती,
वक़्त के साथ शब्दों के रंग फीके हो सकते है,
मगर, तकलीफ़ और दर्द में,
‘जज़्बातों की भाषा’ सा सुकून कोई नहीं देता ।
फ़िर, गुज़ारिश करती है ये जज़्बातों की भाषा ... मुझे बेजान नहीं,
आबाद होने देना।
-विपाशा कश्यप
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