आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तस्वीर जिंदगी की

                
                                                         
                            बना रहा हूं तस्वीर जिंदगी की
                                                                 
                            
कुछ रंग भरना अभी बाकी है

किसी से हारना है
किसी से जितना अभी बाकी है
कोई नाराज है हम से दूर हो चूका है
किसी को मनाना है बहुतों को
गले लगाना अभी बाकी है

दौडता हूं जिंदगी के लिए
सिर्फ लगता है ऐसा पर
मौत के लिए बहुत देर तक
तरसना अभी बाकी है

घुटनो के बल बैठा नहीं कभी
मगर जो हो के भी न हो ऐसा
किसी का कुछ कर्ज भी तो
उतारना अभी बाकी है

वक्त के हैं सभी गुलाम यहां पर
उसको जीना है बहुत
जिंदगी को दफन करना
डूब के जीना अभि बाकी है

आखों में सुरज सी रोशनी हैं
मगर बहुत सारा है अंधेरा
संघर्ष में पिघलकर चमकते
उसे मिटाना अभी बाकी हैं

थकतें नहीं पांव चलते चलते
पहाड़ो पें चढ़ना है
लंबा है रास्ता इस सफर को
तय करना अभी बाकी है

खुशियों का रोज
लगता है यहाँ पर मेला
तन्हाइयों के सन्नाटों से
गुजरना अभी बाकी हैं

बेखौफ चलता हूं
रात दिन को मैं सफर पें हूं
पार तो कर लिया दरिया मैंने
मगर समदंर अभी बाकी है

©विनोद गणेशपुरे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर