आँख मूंदकर किया भरोसा
टूटे दर्पण सा हाल हुआ।
इस दिल की ये दिल ही जाने
कब कितना बेहाल हुआ।
सबके उत्तर देने वाला
खुद ही एक सवाल हुआ।
रख कंधों पर जिम्मेदारी
बेबस और निढ़ाल हुआ।
अपना जिसको माना मैंने
वो जी का जंजाल हुआ।
ठोकर इतनी खाई मैंने
इंसा नहीं फुटबॉल हुआ।
सबको खुशियाँ बाँटते बाँटते
मैं ख़ुद ही कंगाल हुआ
तब-तब मुझको नज़र लगी
जब-जब मैं खुशहाल हुआ।
-विनोद कुमार "विनय"
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