आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरी ग़ज़ल

                
                                                         
                            आँख मूंदकर किया भरोसा
                                                                 
                            
टूटे दर्पण सा हाल हुआ।
इस दिल की ये दिल ही जाने
कब कितना बेहाल हुआ।

सबके उत्तर देने वाला
खुद ही एक सवाल हुआ।
रख कंधों पर जिम्मेदारी
बेबस और निढ़ाल हुआ।

अपना जिसको माना मैंने
वो जी का जंजाल हुआ।
ठोकर इतनी खाई मैंने
इंसा नहीं फुटबॉल हुआ।

सबको खुशियाँ बाँटते बाँटते
मैं ख़ुद ही कंगाल हुआ
तब-तब मुझको नज़र लगी
जब-जब मैं खुशहाल हुआ।
-विनोद कुमार "विनय"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर