सुविधाओं का त्याग
ज़रूरी हो जाता है
पाना हो ख़्वाब तो
नींद छोड़ना
अधूरी पड़ जाता है
जाकर बसा हो
दूर आसमाँ में कहीं
चाँद पाने की कोशिश में
हर दौर उबूरी हो जाता है
- विनोद यादव 'शहीद'
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X