सवाल था नए साल में
क्या बदलना चाहोगे तुम
जवाब आया दिल से
मिले मौका कोशिश
बेहिसाब करेंगे हम
जहाँ को नहीं
ख़ुद ही को बदलना चाहेंगे हम
परवाज़ मिलती नहीं
ग़ैरों के परों से
खुली आँखों मे
अपने ही ख़्वाब बुनेंगे हम
ख़ुद ही ख्वाबों में
अब जान भरेंगे हम
बस इतना ही
बदलाव ख़ुद में लाएंगे हम
मुनासिब नही याद रखें
लगे हर ज़ख्म का हिसाब
अपने सकूँ की ख़ातिर
गुनाह सबके माफ़
करेंगे हम
बस इतना ही
बदलाव ख़ुद में लाएंगे हम
है नही मुमक़िन मुकाबला
चाँद का सूरज से
तालाब का कुएं से
अपने आज से
अपना कल
बेहतर करेंगें हम
बस इतना ही
बदलाव ख़ुद में लाएंगे हम
ये ज़िन्दगी है
नहीं कोई
रंगीत तालीम की जगह
हर दिन आख़िरी
हर घड़ी आख़िरी
समझ जियेंगे हम
बस इतना ही
ख़ुद में बदलाव लाएंगे हम
- विनोद यादव 'शहीद'
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