आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बीते वर्ष : क्या बदलना चाहोगे तुम

                
                                                         
                            सवाल था नए साल में
                                                                 
                            
क्या बदलना चाहोगे तुम
जवाब आया दिल से
मिले मौका कोशिश
बेहिसाब करेंगे हम
जहाँ को नहीं
ख़ुद ही को बदलना चाहेंगे हम

परवाज़ मिलती नहीं
ग़ैरों के परों से
खुली आँखों मे
अपने ही ख़्वाब बुनेंगे हम
ख़ुद ही ख्वाबों में
अब जान भरेंगे हम
बस इतना ही
बदलाव ख़ुद में लाएंगे हम

मुनासिब नही याद रखें
लगे हर ज़ख्म का हिसाब
अपने सकूँ की ख़ातिर
गुनाह सबके माफ़
करेंगे हम
बस इतना ही
बदलाव ख़ुद में लाएंगे हम

है नही मुमक़िन मुकाबला
चाँद का सूरज से
तालाब का कुएं से
अपने आज से
अपना कल
बेहतर करेंगें हम
बस इतना ही
बदलाव ख़ुद में लाएंगे हम

ये ज़िन्दगी है
नहीं कोई
रंगीत तालीम की जगह
हर दिन आख़िरी
हर घड़ी आख़िरी
समझ जियेंगे हम
बस इतना ही
ख़ुद में बदलाव लाएंगे हम

- विनोद यादव 'शहीद'



- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर