आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कक्षा दस

                
                                                         
                            सुनाने को हमारे पास भी ग़म का फ़साना है
                                                                 
                            
दर्द-ए-दिल मेरा सुनिए, ग़ज़ल तो एक बहाना है

"बनेगी वो मेरी दुल्हन", सभी दोस्तों से कहते थे
बात है तब की जब हम कक्षा दस में पढ़ते थे

कुछ पल लगे होंगे उन्हें इनकार करने में
छः साल लग गए थे हमें इज़हार करने में

मुझे मालूम था इनकार से डरता नहीं था मैं
वो ख़ूबसूरत थी और हैंडसम लड़का नहीं था मैं

वर्षों से भी लंबी एक ऐसी रात आई थी
बनी दुल्हन वो घर उसके बारात आई थी

दो दोस्त अपने पास हैं दुनियाँ में ले देकर
चिढ़ाते हैं मुझे अक्सर उसी का नाम ले लेकर
~ विनीत सिंह
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर