मोहल्ला कभी था जो तेरा, अब आबाद नहीं है…
जो काबा-कैलाश था मेरा, वो तेरे बाद नहीं है,,
कहने को अब भी होकर गुज़रता हूँ उन गलियों से मैं…
किसी भी शै से मगर कोई मुराद नहीं है,,
जानता हूँ, गुज़र तो जाएगी किसी तरह से ज़िंदगी…
"बिन तेरे" मगर ये शाद नहीं है…___
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