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वक़्त के पन्ने खुद-ब-खुद खुल जाते हैं सच बताकर।

                
                                                         
                            मुस्कराते हैं जो दूसरों के दर्द पर बराबर,
                                                                 
                            
ऊपर वाला उन्हें भी ज़ख्म देता है चुन चुन कर।
ज़िंदगी खेलती है उसी के साथ अजब खेल,
जो गिराता है किसी को अपनी ताकत पर इतरा कर।
वक्त की मार से कोई नहीं बचा आज तक यहाँ,
हिसाब चुकता होता है सबका पाई-पाई जोड़कर।
फूल की चाहत रखने वाले कांटों से डरें क्यों,
जो जैसा बोएगा, वो पाएगा यहाँ दामन फैलाकर।
कर्मों का लेखा-जोखा कभी टलता नहीं दोस्त,
वक़्त के पन्ने खुद-ब-खुद खुल जाते हैं सच बताकर।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
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55 minutes ago

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