जिस महफ़िल की शान-ओ-शौकत हमारे आग़ाज़ से तौहीन महसूस करती हो,
उसके चर्चे हमारे पर्चों में कभी नहीं होते।
हम वहाँ अपना वक़्त नहीं,
अपना वजूद छोड़ आते हैं,
जहाँ लोग हमारी ख़ामोशी को
हमारी कमज़ोरी समझते हैं।
हमें आदत नहीं किसी के दर पर
अपनी क़ीमत बताने की,
जहाँ सम्मान न मिले,
वहाँ रिश्ते भी नहीं होते।
हमसे दूर होकर खुश हैं जो,
उन्हें खुश ही रहने दो,
हम किसी की ख़ुशी के रास्ते में
कभी दीवार नहीं होते।
हमारी फ़ितरत में झुकना नहीं,
और ज़मीर हमारा बिकता नहीं,
जहाँ इज़्ज़त गिरवी रखनी पड़े,
वहाँ हम कभी खड़े नहीं होते।
— विकास त्रिपाठी ‘विक्की’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X