आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मीठी बोली सामने, पीछे आग लगाय

                
                                                         
                            जमाना लाख कमियाँ गिनाए मुझ में,
                                                                 
                            
पर खुद को मैंने कभी कम आंका नहीं!
जमाने की दुश्वारियों से लड़कर आगे बढ़ा हूँ,
खुद का एक नाम बनाया है मैंने कहीं।।
हवाओं के रुख ने डराना चाहा बहुत,
मगर हौसलों ने दिए आंधियों को जवाब।
हर एक ठोकर ने सिखाया है मुझको हुनर,
यूँ ही मुकद्दर किसी ने सजाया नहीं।।
अंधेरों की साज़िश थी जो हर कदम पर,
मग़र चिरागों ने सीने में शोले जलाए रखे।
यह शोहरत, यह मंजिल जो मेरी है आज,
किसी ने मुझे तोहफ़े में दिलवाया नहीं।।
— विकास त्रिपाठी 
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
29 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर