जमाना लाख कमियाँ गिनाए मुझ में,
पर खुद को मैंने कभी कम आंका नहीं!
जमाने की दुश्वारियों से लड़कर आगे बढ़ा हूँ,
खुद का एक नाम बनाया है मैंने कहीं।।
हवाओं के रुख ने डराना चाहा बहुत,
मगर हौसलों ने दिए आंधियों को जवाब।
हर एक ठोकर ने सिखाया है मुझको हुनर,
यूँ ही मुकद्दर किसी ने सजाया नहीं।।
अंधेरों की साज़िश थी जो हर कदम पर,
मग़र चिरागों ने सीने में शोले जलाए रखे।
यह शोहरत, यह मंजिल जो मेरी है आज,
किसी ने मुझे तोहफ़े में दिलवाया नहीं।।
— विकास त्रिपाठी
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