जिसने प्यार ठुकराया बार-बार,
वो इकरार क्या जानेगा,
जो खुद नहीं जला कभी इश्क़ की आग में,
वो दहकते अंगार क्या जानेगा।
जिसने दर्द को हँसकर टाल दिया,
वो आँखों का इंतज़ार क्या जानेगा,
जिसने दिल कभी हार के देखा ही नहीं,
वो जीत का खुमार क्या जानेगा।
जिसने रिश्तों को सौदा समझा,
वो प्रेम का कारोबार क्या जानेगा,
जिसके हिस्से में बस मतलब आया,
वो निस्वार्थ प्यार क्या जानेगा।
जिसने किसी को खोकर रोया नहीं,
वो बिछड़ने का वार क्या जानेगा,
जो खुद मोहब्बत में टूटा ही नहीं,
वो टूटे दिल का संसार क्या जानेगा।
इश्क़ सिर्फ़ कह देने का नाम नहीं,
ये तो ख़ुद को मिटाने की कहानी है,
जो इस राह पर चला ही नहीं कभी,
वो मोहब्बत की हार क्या जानेगा।
— विकास त्रिपाठी “विक्की”
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