ज़माने भर के दर्द को लफ़्ज़ों में पिरोता हूँ मैं,
आजकल बस कुछ नहीं, दर्दे-दिल की दवा लिखता हूँ मैं।
जो ज़ख़्म दुनिया ने दिए, उन्हें मरहम बना दिया,
हर एक बहते हुए आँसू की अब इल्तिजा लिखता हूँ मैं।
छुप जाता है जो अँधेरा चिराग़ों के तले अक्सर,
उसी ख़ामोश अँधेरे को उम्मीद की वजह लिखता हूँ मैं।
छूट जाते हैं जो साथी अक्सर तरक्की की दौड़ में,
उन तन्हा राहगीरों के लिए वफ़ा का सफ़र लिखता हूँ मैं।
लोग गिरते हुए मकानों से आँखें फेर लेते हैं,
मैं ढहती हुई दीवारों को सब्र की इंतेहा लिखता हूँ मैं।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
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