ज़माने भर के दर्द को लफ़्ज़ों में पिरोता हूँ मैं,
आजकल बस कुछ नहीं, दर्दे-दिल की दवा लिखता हूँ मैं।
— विकास त्रिपाठी 'विक्की'
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