-ग़ज़ल-
हमारे ख़ूँ में ख़ुद्दारी रहेगी।
हमेशा जंग ये जारी रहेगी।
उसूलों पर मिटे हैं लोग कितने।
मेरे सर की भी तैयारी रहेगी।
हमारे क़त्ल पर इतरा रहे हो।
तुम्हारी भी तो कल बारी रहेगी।
खिज़ा बर्बाद करदे बाग़ सारे।
वो ख़ुशबू की तरह तारी रहेगी।
कितना भी ऊंचा बिठाओ शाह को।
कुर्सियों के गिर्द मक्कारी रहेगी।
कालाआमी की शिफ़ा के वास्ते।
ये बोले हैं कि दुश्वारी रहेगी।
-विकास कालाआमी
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