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स्वच्छंद नही मानव

                
                                                         
                            पिछवाड़े म्याओं म्याओ का स्वर सुनाई दिया
                                                                 
                            
बिल्ली पधारी नन्हे नन्हे बच्चों संग,
इंसानियत जागी बिल्ली बच्चों को कराती है स्तनपान,
कटोरा भर दूध दिया,
दो दिन में बच्चे आपस मे एक दूसरे पर कूद फांद कर ने लगे,
बिल्ली बच्चों को छोड़ खाने की तलाश में जाने लगे,
निकट जाने पर बच्चे छोटा छोटा जबड़ा दिखा,क्रोध की मुद्रा में देखता,
आपस मे लड़ते ऊपर चढ़ने का करते
प्रयत्न
शनै.शनै.बिल्ली हुई व्यस्त हुई अपने जीवन में,
हफ्ते दो हफ्ते में बच्चे छोटे छोटे कीड़े पकड़ खाते फिर चूहे,
लक्ष्य यही लड़ भिड कर अपना पेट भरना,
मस्तिष्क में कौंधा एक विचार,
मानव मानव को ढो रहा है
कभी मां बाप अपनी संतानों के लिए संपत्ति सहेजने में जीना भूल जाते हैं,
कभी बुढ़ापे में बच्चे मां बाप का हर छोटा मोटा काम भी स्वयं से नहीं करने देते,
इंसानों के विभाग दो छोटा बड़ा,
अमीर गरीब
नौकर मालिक,
निर्भर रहते एक दूजे पर,
अपना स्वक्छंद जीवन कोई ना जीए,
मानव का दुख का कारण,
सारे जहां की जिम्मेदारी ले कर,
कोसता रहता सांझ सवेरे ,
जीता एक बोझिल जीवन,
मां बाप मोह वश परिश्रम ना करने दें,
संताने कर्तव्य वश,
जानवरों का उद्देश्य भोजन,
पाप पुण्य कर्ज शुभ लाभ से कोई सरोकार नहीं,
झूठ,मक्कारी धोखा से कोई लेना देना नहीं,
ना किसी पर अपना प्रभाव डालना
ना कोई झूठी शान,
इंसान महान है,
पर स्वच्छंद नहीं,
मन का करना चाहता है,
किंतु कर नहीं सकता,
बोलना कुछ चाहता है,
बोलता कुछ और है
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2 वर्ष पहले

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