आत्महत्या-->
अक्सर लोगों के मुँह से सुना है । कायर था उसने आत्महत्या कर ली । जिंदगी में संघर्ष करना चाहिए था।मैं भी इस बात से सहमत हूँ पर कभी कभी दिल बस मजबूर सा हो जाता है उनके बारें में सोचने के लिए जो चले गए।
कितनी हिम्मत से उन्होंने मौत को गले लगाया होगा ।
इतने सारे रिश्ते नाते अपनो का मोह ,फिर भी कुछ था जो उन्हें उस मोड़ पर लाया होगा।
आगे उनके जुबानी-->
अंधकार से निकलने के लिए जिंदगी संघर्ष के नाम करते चले गए ।
जो बस में ना था वो भी काम करते चले गए।
लगा बस एक पड़ाव और फिर जिंदगी मोती सी चमक जाएगी।
औऱ अपनों का साथ है तो ये यौवन की बगिया फूलों सी महक जाएगी।
पर वक़्त के साथ अपनों के बोल भी बदलने लगे थे।
कुछ अपनो के पांव अब हमसे दूर चलने लगे थे।
लाख कोशिश की कुछ समझाऊं उन्हें
पर हर बार कौनसी हक़ीक़त बताऊं उन्हें।
अब दिल धीरे धीरे हताश हो रहा था।
मेरे सपनों का दिया तूफान के पास हो रहा था।
खैर अपने सपने तो छोड़ो पर चंद अपनो के सपनों को छोड़ूं कैसे।
उनकी आशाओं के पौधे को अब तोड़ू कैसे।
हिम्मत अब भी मुझमें खुदको निचोड रही थी।
बिखरे हुए तारों से एक चांद जोड़ रही थी।
उस वक़्त वो अमावस का चंद्रमा बना नही।
और हिम्मत और सपनों का घोल सही से सना(मिक्स) नही।
मेरे नाकामयाबी के धब्बे अब निखर गए।
चंद अपनों के रिश्ते भी तारों सा बिखर गए।
अब जीने की कोई आश नही थी।
सच कहूँ तो मुझमें अब सांस नही थी।
जिंदगी का यूँ शून्य सा होने से ।
मैं डरा नही खुद को उसमें खोने से।
विजय यादव
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