समय हमेशा मरहम नहीं होता
विजय शर्मा एरी
कुछ ज़ख्म खून बहाना छोड़ देते हैं,
पर मरते नहीं।
वे अँधेरे कमरों की तरह भीतर बस जाते हैं,
जहाँ हर रात
यादें अपने नाखून पैने करती हैं
और नींद को जख्मी कर जाती हैं।
लोग कहते हैं, "वक्त सब ठीक कर देगा।"
मगर वक्त ने तो बस
मेरे दर्द की उम्र बढ़ाई है।
घड़ी की सुइयाँ चलती रहीं,
पर मेरे भीतर एक हादसा
उसी दिन पर ठहरा रहा।
मैंने मुस्कानें पहनीं,
जैसे कोई शोकग्रस्त आदमी
त्योहार के कपड़े पहन ले।
बाहर से सब सामान्य दिखा,
पर भीतर टूटने की आवाज़
हर दिन साफ़ सुनाई देती रही।
कुछ रातें ऐसी थीं
जब साँस लेना भी विश्वासघात लगता था।
क्योंकि शरीर ज़िंदा रहना चाहता था,
पर आत्मा थक चुकी थी
उन लड़ाइयों से
जो कभी उसकी थीं ही नहीं।
किताबें कहती हैं,
स्वीकार कर लो, आगे बढ़ो।
पर किताबों ने कहाँ देखा है
कि कुछ सदमे
पैरों में नहीं,
रूह में जंजीर बनकर उतरते हैं।
मैंने भूलने की कोशिश की,
पर यादें शिकारी निकलीं।
जितना भागा, उतना पीछा किया।
जितना दबाया,
उतनी गहरी आवाज़ में
उन्होंने मेरा नाम पुकारा।
फिर एक दिन समझ आया,
शायद जीतने का अर्थ
दर्द को मिटा देना नहीं है।
शायद जीत यह है
कि उसके साथ जीना सीख लिया जाए,
बिना खुद को खोए।
अँधेरा अब भी है।
कभी-कभी पहले से भी ज़्यादा।
पर अब उसके बीच
एक छोटी-सी लौ भी जलती है।
कमज़ोर, काँपती हुई,
फिर भी बुझने से इनकार करती हुई।
हो सकता है घाव कभी न भरें,
हो सकता है कुछ रातें हमेशा कठिन रहें।
पर दर्द का स्थायी होना
आशा की मृत्यु नहीं होता।
दोनों एक ही दिल में
साथ रह सकते हैं।
और यदि आज भी तुम टूटे हुए हो,
तो यह तुम्हारी हार नहीं।
क्योंकि सबसे गहरे अँधेरों में भी
तुम अब तक खड़े हो।
शायद यही उम्मीद है,
कि राख होने के बाद भी तुम आग को याद रखते हो।
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