बिगड़ा हुआ सा बेटा मेरा,
राहों से भटका, रूठा-सा,
कड़वे बोलों के पत्थर फेंके,
माँ का दिल फिर भी टूटा-सा।
“मत आना पास मेरे, माँ,”
वो कहकर मुँह मोड़ लेता है,
आँखों में गुस्सा, शब्दों में ज़हर,
हर दिन मुझे ही तोड़ देता है।
फिर भी जब देर से आता है वो,
दरवाज़े पर दीप जलाती हूँ,
भूखा न हो, थका न हो,
चुपचाप थाली सजाती हूँ।
दुनिया चाहे उसे गलत कहे,
माँ की नज़र में वो मासूम है,
आज भले ही राहें खो दे,
कल बदलेगा—माँ को यक़ीन है।
मैं डाँट नहीं, दुआ बन जाती हूँ,
उसके हर ग़म की छाँह बन जाती हूँ,
वो चाहे जितना ठुकरा दे मुझे,
ममता बनकर फिर लौट आती हूँ।
“बेटा, ग़लतियाँ सब करते हैं,
तू मेरा है, बस यही सच है,”
काँपते होंठों से कहती हूँ,
“माँ का प्यार कभी न रुकता है।”
एक दिन जब थक कर टूटेगा वो,
दुनिया से हार कर आएगा,
माँ की गोद वही मिलेगी उसे,
जहाँ हर दर्द सिमट जाएगा।
माँ हूँ मैं, शर्तें नहीं जानती,
अपमान भी माफ़ कर जाती हूँ,
बेटा बिगड़ा हो या अच्छा हो,
माँ की ममता निभ जाती हूँ।
- विजय शर्मा एरी
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