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सच छुपा पाती हो कैसे…

                
                                                         
                            मेरे सामने किसी और का,
                                                                 
                            
नाम नहीं लेती हो कैसे…
रात-रात भर उससे बातें करके,
मुझसे आँख मिला लेती हो कैसे…

मेरी गैर-मौजूदगी में जिसे,
अपना कहती हो तुम…
मेरे सामने उसी को,
सिर्फ़ दोस्त बता देती हो कैसे…

मैंने तो हर सच तुमसे,
बिना डर के कहा था…
तुम झूठ पर झूठ बोलकर भी,
मुझे ही शक़ी बताती हो कैसे…
-विजय बिंदास राजा
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2 घंटे पहले

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