आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पिताजी !

                
                                                         
                            होती नहीं आपकी आँखे नम
                                                                 
                            
माँ की तरह
पर कहती हैं क्या?
मुझे पता है,
आखिर आपने ही तो
समझाया है मुझे
क्या अच्छा है
और क्या बुरा है.

आपकी कठोरता में
छुपी कोमलता
एक पिता
अपने बेटे से है क्या चाहता?
मुझे पता है.

आपके त्याग, आपकी पीड़ा का
है मोल क्या?
और है मतलब क्या
उस बोल अनमोल का
आप कहें ना कहें
मुझे पता है.

पर मैं
जल्द ही हर लूँगा
आपका सारा दुःख
और सच कर दूंगा
वो सारे सपने
जो देखे हैं
आपकी आँखों ने
प्यारे पिताजी !
क्या आपको पता है?
विद्याधर यादव 'विद्या '
विश्वकर्मा मंदिर, पिपरिस, भदोही, उ प्र
मो. 7408451525   


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर