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बदलते दौर की पुकार

                
                                                         
                            जिल्द किताब से उखड़ रही है,
                                                                 
                            
बस्ते खाली नाच रहे हैं,
आधुनिकता का दौर है आया,
बच्चे आप ही बांच रहे हैं।

कलमबद्धता छूट रही है,
ज्ञान की ज्योति रूठ रही है,
छूट रही सुनने की क्षमता,
विनयशीलता टूट रही है।

अब गुरु शिष्य के रिश्तों में ,
आदर का भाव खो गया,
सख्त नियम के कारण अब,
मर्यादा भाव सो गया।

ना बची है निष्ठा अर्जुन जैसी,
ना कर्ण सा स्वाभिमान है,
ना दृढनिश्चय है भीष्म सा,
ना द्रौपदी सा अभिमान है।

यदि यूं ही मूल बिखर जाएंगे,
संस्कार सब मर जाएंगे,
आने वाली पीढ़ी को फिर,
दुराचारी हम कर जाएंगे,

इनको हमें बचाना होगा,
शिष्टाचार सिखाना होगा,
धर्म अधर्म का पाठ पढ़ाकर,
जीवन-पथ दिखलाना होगा।

करनी होगी बातें इनसे,
इनको ये समझना होगा,
जो बीत गया वो भूत था प्यारे,
नवयुग का दीप जलाना होगा।
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एक घंटा पहले

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