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तुम बहुत छोटी हो

                
                                                         
                            बिटिया, तुम मत बर्दाश्त करो"*
                                                                 
                            
, तुम बिल्कुल मत बर्दाश्त करो,
क्योंकि कोई है जो बर्दाश्त रहा है तुम्हारे लिए,
इस देश के लिए, हम सबके लिए...

लेह की हाड़ कंपा देने वाली सर्दी,
और राजस्थान के रेगिस्तान की तपती लू,
वो भीग रहा है मेघालय की कभी न थमने वाली बारिश में,
और बर्दाश्त कर रहा है अरुणाचल का पल-पल बदलता मौसम,
सिर्फ तुम्हारे लिए।

अच्छा जेन जी, तुमने कहा -
तुम्हारे टैक्स पर पलते हैं सेना के जवान?

तो सुनो राजदुलारी,
सैनिक भी टैक्स देता है, तुम्हारी तरह-मेरी तरह,
पर वो सिर्फ टैक्स नहीं देता...

वो देता है इस देश को अपनी नींद,
अपनी सुविधाएँ, अपनी पूरी जवानी,
गोली लगने पर कई बार अपना हाथ दे देता है,
बारूदी सुरंग फटने पर अपना पाँव दे देता है,
और कभी-कभी बम के धमाके में पूरा शरीर ही।
हाथ, पांव, पेट, पीठ सब कुछ।

तब उसके घरवालों के पास
अंतिम संस्कार के लिए कभी एक जला हुआ बूट पहुंचता है,
कभी एक नेम प्लेट, एक पहचान पत्र, एक बूट
और कभी तो वो भी नहीं...
सिर्फ कुछ अस्थियाँ और एक मुट्ठी मिट्टी।

राजदुलारी, तुम्हारे पास आईफोन हो सकता है,
महँगी गाड़ी हो सकती है,
एक क्लिक पर दुनिया भर की जानकारी हो सकती है,
पर एक सैनिक क्या सहता है, क्या-क्या देता है इस देश को,
ये समझने के लिए तुम्हें अभी और बड़ा होना पड़ेगा...

तुम सचमुच बहुत छोटी हो अभी।

 
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20 minutes ago

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