अंधकार की छाती चीर,
जगा लोक का सोया नीर;
सत्य-सूर्य छुप गया मेघ में,
पाखंडी बैठे गृह-छेद में।
कुटिल मौन में बँधी जिह्वा थी,
छिपी हृदय में गहरी पीड़ा थी;
सामने खड़ा था धर्म का व्यापारी,
गीता बेच रहा था नर-बलिहारी!
माथे पर त्रिपुंड, गले में माला,
मन में विष, मुख पर मधुशाला।
ज्ञान-ध्यान के झूठे आवरण सजाए,
स्वार्थ-सिद्धि को नित नए स्वाँग रचाए।
बोला वह ज्ञानी—"सुनोरे जग के प्राणी!
मैं ही हूँ इस भव-सागर का ज्ञानी।
दान दो, पुण्य लो, मुक्ति द्वार खोलो,
मेरे चरणों में आकर अपना भाग्य टटोलो।"
पर जनता जागी, जब प्रलय-पवन डोला,
सत्य का वज्र गगन में तब बोला—
"छोड़ो यह ढोंग, फेरो मत माला के दाने,
यह युग नहीं मानता अब ठग के बहाने!"
देख दम्भ का यह प्रांगण टूटा,
झूठा आवरण, प्रपंच सारा छूटा।
उठा जन-मन का अजेय हुंकार,
गूँज उठा क्रांति का जय-जयकार!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X