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तू वो शम्मा है जहाँ रौशनी मुफ़्त मिलती है।

                
                                                         
                            जब भी चेहरे पे तेरे कोई ख़ुशी खिलती है,
                                                                 
                            
रूह को मेरी सुकून की वो घड़ी मिलती है।
यूँ तो मिलने को ज़माने में कई लोग मिले,
तू जो मिलती है तो सहरा में नदी मिलती है।
तेरी रंगत में शफ़क़ है, तेरी बातें जैसे,
दर्द-ए-दिल के लिए मरहम की लड़ी मिलती है।
तू हँसे तो ये ज़माना भी हसीं लगता है,
तेरी सादगी में मुझे बात बड़ी मिलती है।
राह-ए-उल्फ़त में, तरन्नुम में, वफ़ा के रंग में,
हर नफ़स में तेरी चाहत की ज़री मिलती है।
ग़म जो आएँ तो हवाओं में उड़ा देती है,
तेरी संगत में हमें ऐसी ताज़ी मिलती है।
आँसुओं से भी हँसी तराश लेती है तू,
मुफ़लिसी में भी तेरे संग सबा ख़ास मिलती है।
तू कोई ख़्वाब है, ताबीर है या साया है?
तेरी सूरत से मुझे अपनी दुआ मिलती है।
दोस्ती ख़ास है तेरी, ये इनायत है रब की,
तेरे होने से ही जीने की अदा मिलती है।
रब रखे तुझको सलामत सदा ऐ मेरी दोस्त,
तू वो शम्मा है जहाँ रौशनी मुफ़्त मिलती है।
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एक घंटा पहले

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