आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विकसित भारत

                
                                                         
                            शाखाएं कटती जाती थीं, दुनिया ये हंसती जाती थी
                                                                 
                            
यह भारत नहीं बचेगा जीवित , बातें ये सुनाई जातीं थी।
कुछ दिन बेसुध सा पड़ा रहा, कुछ उम्मीदों पर था खड़ा रहा
दुनिया ने दिए कष्ट बहुत... फिर भी यह भारत अड़ा रहा।

एक संकल्प लिया था हमने जिसका हमें 47 में परिणाम मिला,
खून बहाया था पुरुखों ने तब जाकर यह हिंदुस्तान ईनाम मिला।
जब जाकर ढूंढा हमने अंग्रेजी इतिहासों में तब था भारत बदनाम मिला,
धरती के कोने-कोने से तब था हमको अपमान मिला।
तोड़ के दासता की जंजीरें फिर से देश को भारत नाम मिला,
अब जाकर 21वीं सदी में सदियों पहले खोया हुआ सम्मान मिला।

जब जब पड़ी जरूरत तब तब अपना लोहा मनवाया है,
बनाकर वैक्सीन खुद भी बचे और दूसरों को भी बचाया है।
ISRO ने भी तिरंगे का परचम क्या खूब लहराया है,
चंद्र मंगल के साथ-साथ आदित्य तक भारत को पहुंचाया है।

ऐसे ही मन से लग रहे तो संकल्प सिद्ध हो जाएगा,
फिर से मेरा भारत एक बार प्रसिद्ध हो जाएगा।
धीरे-धीरे कर कर ही सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा,
कश्मीर से रामेश्वर तक पूरा भारत शिक्षित हो जाएगा।

जो हुआ नहीं दशकों से अब वह कदाचित हो जाएगा,
आने वाले इतिहासों में फिर से स्वर्णिम भारत अंकित हो जाएगा।
और जो सपना हमने देखा है पूरा वह निश्चित हो जाएगा,
हृदय से उसकी आवाज यही अबकी 47 तक मेरा भारत विकसित हो जाएगा।
-वैभव पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर