आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

संभालो तन को और लड़की का चक्कर छोड़ के देखो

                
                                                         
                            है मंज़िल ऊँची तो तुम सीढ़ियों को जोड़ के देखो
                                                                 
                            
कभी इस नौकरी की बेड़ियों को तोड़ के देखो

जो इंसा ये बताए तेरे सपने दूर हैं तुझसे
वो बस एक मील का पत्थर है उसको तोड़ के देखो

अगर क़िस्मत कि रेखा कह रही है हार जाओगे
तो तुम बस जीत आओ और क़िस्मत मोड़ के देखो

बड़ी अच्छी है लगती नींद भी कम्बख्त बिस्तर में
उठो अब नींद से कम्बख्त बिस्तर छोड़ के देखो

तुम्हारा तन भी डोलेगा तुम्हारा मन भी डोलेगा
संभालो तन को और लड़की का चक्कर छोड़ के देखो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर