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क्या है मंज़िलों की भी मंज़िल?

                
                                                         
                            क्या है मंज़िलों की भी मंज़िल?
                                                                 
                            
ये भ्रम भ्रमित कर जाता है।
क्या है दिल उन्हीं का बुज़दिल?
जो मंज़िल को पास बुलाता है!
क्या उसका दिल भी है बुज़दिल?
जिसकी मंज़िल ही आसमान है।
जिसकी ऊर्जा को ज़िंदा रखना ही,
उसकी मंज़िल की तान है।
जिसकी मंज़िल ही आसमान है,
उसकी मंज़िल ही आसमान है!
नहीं बुलाता वो अपनी मंज़िल को,
क्योंकि मंज़िल ही उसका अरमान है।
क्या है दिल उन्हीं का बुज़दिल?
जो मंज़िल को पास बुलाता है।
हाँ, है दिल उन्हीं का बुज़दिल,
जो सिर्फ़ ख़्वाबों में ही समा जाता है।
हाँ, है दिल उन्हीं का बुज़दिल,
जो सिर्फ़ ख़्वाबों में ही समा जाता है।
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4 महीने पहले

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