आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उस भीड़ में अपना इक मकान भी तो था

                
                                                         
                            कुछ तो मानो तुम भी
                                                                 
                            
जिद ना ठानो तुम भी
क्यूं कर रहे ऐसा
जो चाहते हो वो ना कर पाओगे

सबकुछ मिला तो था
कोई गिला ना था
उस भीड़ में अपना इक मकान भी तो था

उसे घर ना बनाया तुमने
उसमें दिल न बसाया तुमने
अपना हीं चलाया तुमने
रिश्ता ना निभाया तुमने

जब लौटना ना तुमको
तो क्यूं वापस आते हो
जो दिल में ना रखना
तो मकान क्या होगा

जब घर ना बसा पाओगे
दिल ना लगा पाओगे
तो लगान क्या होगा
अब सोच लो तुम भी
जब लौटना चाहोगे
बड़ी देर कर दोगे
ढूंढ ना पाओगे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर